उज्जायी प्राणायाम — विधि और फायदे
उज्जायी प्राणायाम, जिसे 'समुद्र की सांस' भी कहते हैं, गले को हल्का संकुचित करके धीमी, गहरी सांस लेने की विधि है। पूरी विधि और फायदे जानें, Habuild के साथ।

Key Takeaways
- गले के पिछले हिस्से को हल्का संकुचित करने से समुद्र की लहरों जैसी आवाज़ बनती है।
- ‘उज्जायी’ यानी विजयी – सांस पर पूरी तरह नियंत्रण पाने वाला अभ्यास।
- शुरुआत मुंह खुला रखकर ‘हा’ की आवाज़ से करें, फिर नाक से अभ्यास करें।
- विन्यास और अष्टांग योग में आसनों के साथ लगातार इस्तेमाल किया जाता है।
- गले पर ज़्यादा ज़ोर न डालें – संकुचन हल्का ही रखें, दबाव नहीं।
- गले में सूजन या हाल की सर्जरी हो तो अभ्यास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
उज्जायी प्राणायाम को “विजयी सांस” या “समुद्र की सांस” भी कहा जाता है — इसमें गले के पिछले हिस्से को हल्का सा संकुचित करते हुए धीमी, गहरी सांस ली जाती है, जिससे समुद्र की लहरों जैसी हल्की आवाज़ पैदा होती है। “उज्जायी” शब्द संस्कृत के “उद्” (ऊपर, विजयी) और “जय” (जीत) से मिलकर बना है, यानी सांस पर पूरी तरह नियंत्रण पाने वाला अभ्यास। यही कारण है कि इसे केवल एक शांत करने वाली तकनीक ही नहीं, बल्कि सांस पर सजग नियंत्रण सिखाने वाला अभ्यास भी माना जाता है।
Ujjayi Breath Steps
Ujjayi breath steps को समझना आसान है, बस गले का संकुचन सही ढंग से महसूस करना ज़रूरी है:
- रीढ़ सीधी रखते हुए आराम से बैठें, आंखें बंद करें, नाक से गहरी सांस लें।
- गले के पिछले हिस्से को हल्का संकुचित करें, जैसे कांच पर भाप छोड़ते समय होता है — शुरुआत में मुंह खुला रखकर “हा” की आवाज़ के साथ अभ्यास करना आसान रहता है।
- एक बार यह संकुचन महसूस होने लगे, तो मुंह बंद रखते हुए नाक से ही धीरे-धीरे सांस छोड़ें, हल्की गुनगुनाहट जैसी आवाज़ के साथ।
- सांस अंदर लेते समय भी वही हल्का संकुचन बनाए रखें, ताकि आवाज़ सांस के दोनों चरणों में सुनाई दे।
- यह लय बनाए रखते हुए 5-10 मिनट अभ्यास करें, धीरे-धीरे समय बढ़ाया जा सकता है।
आम गलतियां: गले पर बहुत ज़्यादा ज़ोर डालना सबसे सामान्य गलती है, जिससे गला थकने या खराश महसूस हो सकती है — संकुचन हल्का ही होना चाहिए, दबाव नहीं। दूसरी गलती है सांस को जबरन धीमा करना; लय स्वाभाविक रहनी चाहिए, गिनकर या रोककर नहीं। अगर आवाज़ बहुत तेज़ या कर्कश लगे, तो इसका मतलब है संकुचन ज़रूरत से ज़्यादा है — इसे थोड़ा ढीला करें।
Ujjayi Breath Technique — फायदे
Ujjayi breath technique का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह मन को तुरंत शांत करता है और योगासन करते समय सांस पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद करता है। यही कारण है कि विन्यास और अष्टांग योग जैसी शैलियों में उज्जायी प्राणायाम को आसनों के साथ लगातार इस्तेमाल किया जाता है — सांस की आवाज़ अभ्यासी को यह भी बताती रहती है कि सांस बहुत तेज़ या असमान तो नहीं हो गई। इससे शरीर में हल्की गर्मी और एकाग्रता भी बढ़ती है, और लंबे आसन अभ्यास के दौरान थकान कम महसूस होती है।
Photo: Jesus Bonilla, Public domain, via Wikimedia Commons
उज्जायी प्राणायाम और सामान्य सांस में फर्क
सामान्य सांस में हवा बिना किसी रुकावट के गले से गुज़रती है, जबकि उज्जायी प्राणायाम में गले का हल्का संकुचन एक तरह का प्राकृतिक “प्रतिरोध” बनाता है। यह प्रतिरोध सांस को अपने आप धीमा कर देता है, जिससे हर सांस लंबी और गहरी होती है — बिना यह गिनने के कि कितनी देर सांस लेनी है। यही वजह है कि उज्जायी प्राणायाम को प्राणायाम की दुनिया में सांस-नियंत्रण सीखने का सबसे सहज तरीका माना जाता है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें कुंभक (सांस रोकना) अभी सीखना है।
सावधानियां
उज्जायी प्राणायाम अधिकतर लोगों के लिए सुरक्षित है, लेकिन गले पर ज़्यादा ज़ोर न डालें और अगर हल्का चक्कर महसूस हो तो रुक जाएं। कम रक्तचाप वाले लोग सावधानी से अभ्यास करें। गले में सूजन, टॉन्सिल की समस्या या हाल ही में गले की सर्जरी हुई हो तो अभ्यास से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। गर्भावस्था के दौरान भी किसी अनुभवी शिक्षक की निगरानी में ही इसे सीखना उचित है। जिन्हें साइनस या नाक बंद रहने की शिकायत हो, वे नाक से गहरी सांस लेने में शुरुआत में दिक्कत महसूस कर सकते हैं — ऐसे में धीरे-धीरे, कम समय से शुरुआत करना बेहतर रहता है, और ज़रूरत पड़ने पर मुंह से भी हल्की सांस ली जा सकती है जब तक नाक साफ़ न हो जाए।
अंग्रेज़ी में इस अभ्यास की गहराई से जानकारी के लिए Ujjayi Pranayama गाइड देखें।
अभ्यास को धीरे-धीरे कैसे बढ़ाएं
पहले हफ्ते में सिर्फ 2-3 मिनट का अभ्यास काफी है, ताकि गले का संकुचन सही ढंग से महसूस होना सीखा जा सके। इसके बाद हर हफ्ते 1-2 मिनट जोड़ते हुए 10 मिनट तक पहुंचा जा सकता है। जब गले का हल्का संकुचन बिना सोचे-समझे अपने आप बना रहने लगे, तभी इसे आसनों के साथ जोड़ना शुरू करें — पहले सिर्फ सांस पर ध्यान देना, फिर उसे शरीर की गतिविधि के साथ मिलाना, यही स्वाभाविक क्रम है। जल्दबाज़ी में इसे आसनों के साथ शुरू करने से गले पर अनावश्यक दबाव पड़ सकता है।
नाड़ी शोधन प्राणायाम जैसे अन्य श्वास अभ्यासों के साथ इसे बदल-बदलकर करना भी उपयोगी रहता है — उज्जायी प्राणायाम एकाग्रता और गर्मी के लिए, तो नाड़ी शोधन संतुलन और शांति के लिए। हमारी गाइड Nadi Shodhan Pranayam में इसकी पूरी विधि देखी जा सकती है।


